Andhiyaara Dhalkar Hi Rahega !!! - अंधियारा ढलकर ही रहेगा

This definitely has to be a lucky day of my life. I have been searching for this poem for the past seven years approximately and I find it today. :) :D

I found the original transliterated into English at Kashish.

I couldn't resist the temptation. Hence took some time to transliterate back to the original !!!

Yippeee.. And it has come out really really well.. Oh. I feel seriously so happy...

My tribute to Neelam Ma'm, who taught me this poem.

आंधियाँ चाहे उठाओ बिजलियाँ चाहे गिराओ
जल गया है दीप तो अंधियारा ढलकर ही रहेगा

रौशनी पूँजी नहीं है,जो तिजोरी में समाए
वोह खिलौना भी न,जिसका दाम हर ग्राहक लगाए
वोह पसीने की हँसी है,वह शहीदों की उम्र है
जो नया सूरज उगाये जब तड़प कर तिलमिलाए
उग रही लौ को न टोको,ज्योति के रथ को न रोको.
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा
जल गया है दीप तो अंधियारा ढल कर ही रहेगा ...

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है
टोक दो तो आँधियों की बोलियों में बोलती है
वह नहीं क़ानून मानें,वह नहीं प्रतिबन्ध माने
वह पहाड़ियों पर बदलियों सी उचलती डोलती है
जाल चांदी का लपेटो,खून का सौदा समेटो
आदमी हर क़ैद से बाहर निकलकर ही रहेगा
जल गया है दीप तो अंधियारा ढलकर ही रहेगा

वक़्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है
क्यों न कितनी ही बड़ी हो,क्यों न कितनी ही कठिन हो
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है
उस सुबह से संधि कर लो हर किरण की मांग भर लो
है जगा इंसान तो मौसम बदलकर ही रहेगा
जल गया है दीप तो अंधियारा ढलकर ही रहेगा






Sunday, February 27, 2011 by Hari
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